झारखंड की राजधानी रांची के धुर्वा स्थित ऐतिहासिक और आस्था के केंद्र श्री जगन्नाथ मंदिर में वार्षिक रथयात्रा महोत्सव की तैयारियां बेहद तेज हो गई हैं। पुरी की विश्वप्रसिद्ध तर्ज पर निकलने वाली इस भव्य रथयात्रा के लिए मंदिर परिसर में भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के रथ का निर्माण युद्धस्तर पर चल रहा है। इस वर्ष रथ को और भी अधिक आकर्षक व भव्य बनाने के लिए ओडिशा से विशेष रूप से अनुभवी कारीगर बुलाए गए हैं, जो पारंपरिक शिल्पकला के अनुसार दिन-रात रथ तैयार कर रहे हैं। इस महाआयोजन को लेकर न सिर्फ रांची बल्कि पूरे झारखंड के श्रद्धालुओं में भारी उत्साह देखा जा रहा है। धार्मिक परंपराओं के अनुसार, आगामी 29 जून को 'देव स्नान यात्रा' के साथ इस महापर्व की शुरुआत हो जाएगी। इस पावन दिन पर भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा को महास्नान कराया जाएगा। इसके तुरंत बाद तीनों विग्रह 'अनासर काल' (एकांतवास) में प्रवेश कर जाएंगे। धार्मिक मान्यता है कि इस विशेष स्नान के बाद भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं और 15 दिनों तक एकांतवास में रहते हैं। इस अवधि के दौरान मुख्य मंदिर का गर्भगृह आम श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए पूरी तरह बंद रहेगा।
अनासर काल की समाप्ति के बाद आगामी 15 जुलाई को मंदिर में 'नेत्रोत्सव' (नेत्रदान) का आयोजन किया जाएगा, जिसमें विधि-विधान के साथ भगवान के नेत्रों का पुनः अंकन होगा। इसके ठीक अगले दिन यानी 16 जुलाई को भव्य रथयात्रा निकाली जाएगी। इस महायात्रा में भगवान जगन्नाथ अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र के साथ विशाल रथ पर सवार होकर अपनी मौसी के घर (मौसीबाड़ी) के लिए प्रस्थान करेंगे। रथयात्रा के शुरू होते ही धुर्वा का ऐतिहासिक 10 दिवसीय रथ मेला भी प्रारंभ हो जाएगा, जो झारखंड की सांस्कृतिक पहचान का एक अनूठा हिस्सा है। इस वर्ष मेले के सफल संचालन के लिए जिला प्रशासन ने 29 जून से टेंडर प्रक्रिया शुरू करने का निर्णय लिया है। इस बार मेले का बेस प्राइस 1 करोड़ 5 लाख रुपये निर्धारित किया गया है। धुर्वा का यह मेला झारखंड के सबसे बड़े पारंपरिक मेलों में शुमार है। यहाँ रांची के अलावा देवघर, दुमका सहित पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल और ओडिशा से भारी संख्या में व्यापारी अपनी दुकानें लगाने पहुंचते हैं। मेले में पारंपरिक मिठाइयों (जैसे खाजा), हस्तशिल्प, आदिवासी संस्कृति के प्रतीक तीर-धनुष, मांदर, कृषि उपकरण, घरेलू साजो-सामान के साथ-साथ बच्चों के मनोरंजन के लिए बड़े-बड़े झूले मुख्य आकर्षण होते हैं। धुर्वा के इस श्री जगन्नाथ मंदिर का निर्माण वर्ष 1691 में नागवंशी शासकों द्वारा कराया गया था। लगभग 250 फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर अपनी वास्तुकला के लिए भी जाना जाता है। वर्ष 1991 में इसका भव्य पुनर्निर्माण कराया गया था।