Mar 01, 2026

2027 के रण की तैयारी तेज: भाजपा ने अभेद्य मानी जाने वाली सीटों के लिए बनाया विशेष ऑपरेशनल 'वॉर रूम'

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देहरादून। उत्तराखंड में लगातार नौ साल से सत्ता में काबिज भाजपा अब विधानसभा चुनाव में जीत की हैट्रिक लगाने के लक्ष्य के साथ उन सीटों पर भी पूरी ताकत झोंकने जा रही है, जहां पिछले 20 से 25 वर्षों में पार्टी एक भी जीत दर्ज नहीं कर सकी। संगठन ने ऐसी सीटों को “अभेद्य दुर्ग” मानते हुए विशेष रणनीति तैयार की है, ताकि लंबे समय से चले आ रहे सूखे को खत्म किया जा सके।

प्रदेश संगठन ने पिछले चुनाव में कम अंतर से जीत या हार वाली 23 सीटों को चिह्नित किया है। इन सीटों पर बूथ स्तर से लेकर राज्य स्तर तक पांच चरणों में सर्वे कराने की योजना बनाई गई है। एक सर्वे पूरा हो चुका है, जबकि दो सर्वे मार्च और अप्रैल में होंगे। इसके बाद राज्य स्तर का व्यापक सर्वे होगा। जब संभावित प्रत्याशियों का पैनल केंद्रीय नेतृत्व को भेजा जाएगा, तो वहां से भी अलग से सर्वे कराया जाएगा। उद्देश्य साफ है—ऐसे चेहरे और समीकरण तलाशना, जो दशकों से बंद पड़े दरवाजे खोल सकें। कुछ सीटें भाजपा के लिए लंबे समय से चुनौती बनी हुई हैं। देहरादून की एक प्रमुख सीट पर 2002 से 2022 तक लगातार कांग्रेस के प्रीतम सिंह जीतते रहे। 2017 में भाजपा यहां महज 1,543 वोटों से हार गई थी, लेकिन जीत का आंकड़ा छू नहीं सकी। इसी तरह परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई एक अन्य सीट पर 2012, 2017 और 2022 में कांग्रेस के फुरकान अहमद लगातार जीतते रहे हैं। जातीय और धार्मिक समीकरणों के चलते भाजपा यहां अभी तक खाता नहीं खोल पाई है।

कुमाऊं की धारचूला सीट भाजपा के लिए सबसे कठिन मानी जाती है। 2002 और 2007 में यहां निर्दलीय उम्मीदवार जीते, जबकि 2012 से 2022 तक लगातार कांग्रेस के हरीश धामी विधायक रहे हैं। 2014 के उपचुनाव में भी भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। इसी तरह हल्द्वानी सीट पर 20 वर्षों से भाजपा को स्थायी सफलता नहीं मिली। 2007 में बंशीधर भगत की जीत को छोड़ दें तो यह सीट कांग्रेस के पास ही रही है। भगवानपुर सीट भी भाजपा के लिए चुनौती बनी हुई है। 2002 के बाद 2007 और 2012 में बसपा, जबकि 2017 और 2022 में कांग्रेस ने यहां जीत दर्ज की। वहीं यमुनोत्री सीट पर भी भाजपा का रिकॉर्ड उतार-चढ़ाव भरा रहा है। 2017 में एक बार सफलता मिली, लेकिन 2022 में सीट फिर हाथ से निकल गई। प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट का कहना है कि इन सीटों पर पार्टी की रणनीति त्रिकोणीय मुकाबला बनाने की है, जिससे जीत की राह आसान हो सके। संगठन सामाजिक समीकरण, स्थानीय नेतृत्व की स्वीकार्यता और बूथ प्रबंधन को लेकर विशेष योजना पर काम कर रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भाजपा इन परंपरागत रूप से कमजोर सीटों में सेंध लगाने में सफल होती है, तो यह न केवल चुनावी गणित बदलेगा, बल्कि विपक्ष के मजबूत गढ़ों में भी मनोवैज्ञानिक बढ़त दिलाएगा। अब देखना होगा कि सर्वे और रणनीति का यह बहुस्तरीय प्रयोग भाजपा को इन अभेद्य दुर्गों पर विजय दिला पाता है या नहीं।